ग़ज़ल : ग़ुमनाम बनकर यहाँ जीना होगा…..

ग़ुमनाम बनकर यहाँ जीना होगा,
समंदर हो तुम ओक से पीना होगा।

आपके ख़ज़ाने में ये कैसी ख़ुशबू,
किसी मेहनकश का पसीना होगा।

सिर्फ़ इंसानियत का मज़हब होगा,
न मन्दिर होंगे यहाँ न मदीना होगा।

कलन्दरों को कल की फ़िक्र नहीं,
कहाँ जीने का उनको करीना होगा।

तुमने ग़र मुरादों में माँगा है मुझे,
सावन मेरे आने का महीना होगा।

-रेवन्ता


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